Мосгорсуд незначительно изменил приговор футболистам Павлу Мамаеву и Александру Кокорину и еще двум обвиняемым по делу о драках в Москве. Суд удовлетворил требования прокурора, но не внял просьбам защиты.
Прокурор просила уточнить в приговоре братьям Кокориным пункт статьи, по которой они были признаны виновными, квалифицировав действия подсудимых как хулиганство "с использованием предмета в качестве оружия".
Формально суд вынес новый приговор, однако на сроках наказания решение апелляционной инстанции не отразилось - у всех четверых подсудимых они остались прежними.
Теперь приговор вступил в законную силу и подлежит исполнению.
8 мая Пресненский суд Москвы приговорил Александра и Кирилла Кокориных к году и шести месяцам колонии, а Мамаева и друга футболистов Александра Протасовицкого - к одному году пяти месяцам.
Все подсудимые, кроме Кокорина-младшего, были признаны виновными по всем вменяемым им статьям. Однако судья исключила из квалификации их действий предварительный сговор, решив, что они действовали спонтанно и не распределяли роли. Таким образом, суд не согласился с оценкой следствия.
Всем четверым подсудимым изначально были предъявлены обвинения в хулиганстве, совершенном группой лиц по предварительному сговору. Мамаева также обвинили в умышленном причинении легкого вреда здоровью и побоях. А Кокорину-старшему вменяли два эпизода умышленного причинения легкого вреда, в том числе с применением предмета (стула) в качестве оружия.
"Хотелось бы выйти"
Апелляции на приговор подавала как защита, так и обвинение. Их рассматривала коллегия из трех судей. Все адвокаты настаивали на исключении хулиганства из квалификации действий футболистов, а также указывали, что суд не учел показания свидетелей, говоривших в пользу осужденных, и их заслуги.
На заседании присутствовали все четверо осужденных - полузащитник "Краснодара" Павел Мамаев, нападающий "Зенита" Александр Кокорин, его младший брат Кирилл и друг футболистов Александр Протасовицкий.
Мамаев, отвечая на вопрос, чего он просит от суда, заявил: "Восемь месяцев мы просим, я просить не хочу, я хочу высказаться. Все происходящее - это позор, начиная со следствия и заканчивая Пресненским судом. Я уверен на 1000%, что ничего сегодня не изменится, и это очередное шоу для телевидения и Первого канала".
Кокорин-старший просил у суда справедливости и "чтобы люди, которые отвечают за судьбы других людей, разбирались по закону". Его брат был лаконичен: "Хотелось бы выйти".
Протасовицкий отметил, что ему "хотелось бы за восемь месяцев увидеть, что у нас в стране есть правосудие".
"Юридический троцкизм" и римское право
В то время как адвокаты осужденных оспаривали законность приговора и настаивали на смягчении обвинений, прокурор просила апелляционную инстанцию всего лишь внести в вердикт незначительную правку.
В своей жалобе представитель обвинения обращала внимание на то, что суд первой инстанции, убрав из приговора предварительный сговор, забыл добавить в него название пункта из статьи о хулиганстве.
Защитник Мамаева Игорь Бушманов описал представление прокурора как "юридический троцкизм". "Ни войны, ни мира!" - негодовал он.
Прокурор Зверева в свою очередь усомнилась в том, что выводы суда первой инстанции можно подвергнуть сомнению. Такое возможно только в редких случаях, когда суд, например, не учел определенные доказательства, а в данном деле они были учтены в полной мере, пояснила она.
"Facta concludentia, как говорили древние римляне - а у нас законы идут еще оттуда, - напомнила прокурор. - Считаю, что справедливо указаны отягчающие обстоятельства у каждого осужденного. Правосудие должно быть свободным! Суд у нас не-за-ви-сим", - подчеркнула она.
Вячеслав Барик, адвокат Кокорина-младшего, поблагодарил прокурора за "яркое выступление" и желание разобраться в деле. "Мы все знаем слова, русский язык, что их можно использовать, употреблять, формулировать, - рассуждал адвокат, - но законодатель исходил из того, что в них должна быть логика и разумность".
Барик настаивал на том, что суд учел не все обстоятельства дела - например, тот факт, что потерпевшие, по его мнению, оскорбляли и провоцировали осужденных (потерпевшие на суде это отрицали).
Адвокат Кокорина-старшего Татьяна Стукалова обращала внимание на заслуги своего подзащитного и ругала журналистов, за что получила замечание от судьи.
Также она сделала акцент на социальном положении потерпевших: "Конечно, мы негодуем. Мы знаем практику. И понимаем, что если бы это были другие потерпевшие и это бы расследовалось в рамках закона, никто бы из них [осужденных] не был под стражей. Мы призываем [суд] к гуманности".
Еще один адвокат нападающего "Зенита" Андрей Ромашов рассказывал, что его подзащитному в СИЗО "сожгли ногу электрофорезом" и просил Мосгорсуд если не оправдать, то "хотя бы изменить наказание на колонию-поселение".
Friday, June 14, 2019
Wednesday, May 29, 2019
रूसी लड़की के साथ वीडियो पर गिर गई ऑस्ट्रियाई सरकार
रूसी लड़की के साथ ऑस्ट्रियाई फ्रीडम पार्टी के नेता के लीक हुए वीडियो के बाद शुरू हुआ हंगामा थमने का नाम नहीं ले रहा है.
इस स्कैंडल की वजह से ऑस्ट्रिया की मौजूदा सरकार गिर गई है. ऑस्ट्रियाई चांसलर सेबेस्टियन कुर्ज़ की विदाई हो गई है. संसद के विशेष सत्र में बुलाए गए अविश्वास प्रस्ताव में कुर्ज़ समर्थन हासिल नहीं कर पाए.
उनके पूर्व सहयोगी फ्रीडम पार्टी और विपक्षी दल सोशल डेमोक्रेट्स ने अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन किया था.
ऑस्ट्रियाई राष्ट्रपति एलेक्जेंडर वेन डेर बेलन ने मौजूदा वाइस चांसलर हर्टविग लॉगर को अंतरिम नेता नियुक्त किया है.
वीडियो से शुरू हुआ विवाद
दरअसल ये पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब जर्मन मीडिया में एक वीडियो पब्लिश हुआ था. यह वीडियो गुपचुप तरीके से 2017 में स्पेन के द्वीप इबिसा में रिकॉर्ड किया गया था. यह 2017 में देश के अंदर हुए चुनाव से पहले का वीडियो है.
जर्मन मीडिया में प्रसारित इस वीडियो के फुटेज में यह नजर आ रहा है कि फ्रीडम पार्टी के नेता और जर्मनी के मौजूदा सरकार में वाइस चांसलर रहे हेनिज़ क्रिश्चियन स्टार्के अपनी ही पार्टी के अहम नेता जोहान्ना गुडेनस के साथ बात कर हैं.
इस वीडियो में दोनों नेता एक रूसी महिला के साथ बैठे और ड्रिंक्स लेते भी देखे जा रहे हैं. बताया जा रहा है कि ये महिला किसी रूसी बिजनेसमैन की भतीजी है.
इस वीडियो में स्टार्के उस महिला से ऑस्ट्रियाई समाचार पत्र कोरेनेन जिटुंग में बड़ी हिस्सेदारी ख़रीदकर फ्रीडम पार्टी की मदद करने की अपील कर रहे हैं और इसके बदले में मदद देने की बात कर रहे हैं.
इस वीडियो को किसने शूट किया है, इसका पता नहीं चल पाया है लेकिन इसके सामने आने के कुछ ही घंटों के बाद कुर्ज़ ने स्टार्के को हटाने का फ़ैसला लिया. स्टार्के को अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा.
इसके बाद फ्रीडम पार्टी के दूसरे मंत्रियों ने भी इस्तीफ़ा दे दिया और इसके बाद से बाद सरकार अल्पमत में आ गई.
क्या हुआ संसद में
ऑस्ट्रियाई पीपल्स पार्टी के प्रमुख सेबेस्टियन कुर्ज़, आस्ट्रिया के ऐसे पहले चांसलर बन गए हैं जिनकी सरकार अविश्वापस प्रस्ताव में गिर गई है. 2017 में वे महज 31 साल की उम्र में ऑस्ट्रिया के चासंलर बने.
संसद के अंदर विपक्षी दलों ने दो अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था- एक तो कुर्ज़ के ख़िलाफ़ था और दूसरा सरकार के ख़िलाफ़ और ये दोनों अविश्वास प्रस्ताव पास हो गए.
हालांकि यूरोपीय संघ के रविवार को हुए चुनाव में कुर्ज़ को करीब 35 प्रतिशत मत मिले थे लेकिन यह समर्थन सरकार बचाने के लिए नाकाफ़ी साबित हुआ.
इस स्कैंडल की वजह से ऑस्ट्रिया की मौजूदा सरकार गिर गई है. ऑस्ट्रियाई चांसलर सेबेस्टियन कुर्ज़ की विदाई हो गई है. संसद के विशेष सत्र में बुलाए गए अविश्वास प्रस्ताव में कुर्ज़ समर्थन हासिल नहीं कर पाए.
उनके पूर्व सहयोगी फ्रीडम पार्टी और विपक्षी दल सोशल डेमोक्रेट्स ने अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन किया था.
ऑस्ट्रियाई राष्ट्रपति एलेक्जेंडर वेन डेर बेलन ने मौजूदा वाइस चांसलर हर्टविग लॉगर को अंतरिम नेता नियुक्त किया है.
वीडियो से शुरू हुआ विवाद
दरअसल ये पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब जर्मन मीडिया में एक वीडियो पब्लिश हुआ था. यह वीडियो गुपचुप तरीके से 2017 में स्पेन के द्वीप इबिसा में रिकॉर्ड किया गया था. यह 2017 में देश के अंदर हुए चुनाव से पहले का वीडियो है.
जर्मन मीडिया में प्रसारित इस वीडियो के फुटेज में यह नजर आ रहा है कि फ्रीडम पार्टी के नेता और जर्मनी के मौजूदा सरकार में वाइस चांसलर रहे हेनिज़ क्रिश्चियन स्टार्के अपनी ही पार्टी के अहम नेता जोहान्ना गुडेनस के साथ बात कर हैं.
इस वीडियो में दोनों नेता एक रूसी महिला के साथ बैठे और ड्रिंक्स लेते भी देखे जा रहे हैं. बताया जा रहा है कि ये महिला किसी रूसी बिजनेसमैन की भतीजी है.
इस वीडियो में स्टार्के उस महिला से ऑस्ट्रियाई समाचार पत्र कोरेनेन जिटुंग में बड़ी हिस्सेदारी ख़रीदकर फ्रीडम पार्टी की मदद करने की अपील कर रहे हैं और इसके बदले में मदद देने की बात कर रहे हैं.
इस वीडियो को किसने शूट किया है, इसका पता नहीं चल पाया है लेकिन इसके सामने आने के कुछ ही घंटों के बाद कुर्ज़ ने स्टार्के को हटाने का फ़ैसला लिया. स्टार्के को अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा.
इसके बाद फ्रीडम पार्टी के दूसरे मंत्रियों ने भी इस्तीफ़ा दे दिया और इसके बाद से बाद सरकार अल्पमत में आ गई.
क्या हुआ संसद में
ऑस्ट्रियाई पीपल्स पार्टी के प्रमुख सेबेस्टियन कुर्ज़, आस्ट्रिया के ऐसे पहले चांसलर बन गए हैं जिनकी सरकार अविश्वापस प्रस्ताव में गिर गई है. 2017 में वे महज 31 साल की उम्र में ऑस्ट्रिया के चासंलर बने.
संसद के अंदर विपक्षी दलों ने दो अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था- एक तो कुर्ज़ के ख़िलाफ़ था और दूसरा सरकार के ख़िलाफ़ और ये दोनों अविश्वास प्रस्ताव पास हो गए.
हालांकि यूरोपीय संघ के रविवार को हुए चुनाव में कुर्ज़ को करीब 35 प्रतिशत मत मिले थे लेकिन यह समर्थन सरकार बचाने के लिए नाकाफ़ी साबित हुआ.
Sunday, May 12, 2019
Führende Scientologen gehören zu den aktivsten Immobilienplayern der Stadt
Ein Firmengeflecht rund um die Swiss Immo Trust AG in Kaiseraugst war massgeblich an der Finanzierung der Scientology-Zentrale am Rande Basels beteiligt. Recherchen der TagesWoche zeigten, wie führende Personen in diesen Firmen mit ihren namhaften Spenden einen Grossteil des Sektentempels an der Burgfelderstrasse finanzierten.
Doch nicht nur innerhalb des Basler Ablegers von Scientology ist dieses Unternehmen eine relevante Grösse. Wie unsere Datenauswertung zeigt, gehört die Swiss Immo Trust zu den wichtigsten Akteuren im Geschäft der Umwandlung von Mietwohnungen in Stockwerkeigentum.
Die TagesWoche hat die im Kantonsblatt publizierten Handänderungen auf dem Basler Immobilienmarkt seit Mitte 2008 ausgewertet. Eine solche Transaktion beschreibt den Verkauf einer Immobilie. Naturgemäss geschieht dies bei der Umwandlung in Stockwerkeigentum in relativ kurzer Zeit gleich mehrfach. Ein Unternehmen kauft eine Liegenschaft auf, renoviert oder baut neu und bringt die Wohnungen daraufhin einzeln auf den Markt. Statt einem einzelnen Eigentümer gibt es nun viele verschiedene.
Umstrittenes Business
Dieses Business gilt deshalb als umstritten, weil dadurch sehr oft günstiger Wohnraum verloren geht. Bevor die Umwandlung in Wohneigentum möglich ist, müssen die bisherigen Mieter nämlich weichen.
Zwischen 2010 und 2014 war die Swiss Immo Trust an über 50 solcher Handänderungen beteiligt. Bei 43 davon ging es um Stockwerkeigentum, verteilt auf insgesamt fünf Bauprojekte. Die Liegenschaften befinden sich allesamt im Gebiet zwischen Schützenmatt- und Kannenfeldpark. Bei all diesen Projekten immer mit dabei: Rudolf Flösser, leitender Direktor von Scientology Basel.
Grösstes Projekt war die Überbauung zwischen der Türkheimerstrasse und dem Spalenring. Dort kaufte die Swiss Immo Trust zwei ältere Liegenschaften auf, um sie durch einen Neubau mit 21 Eigentumswohnungen zu ersetzen.
Das Projekt an der Türkheimerstrasse wurde von der
BW-Liegenschaftsverwaltung geleitet, die sich ebenfalls in den Händen einer Scientologin befindet.
Dies Leitung dieses Projekts oblag der BW-Liegenschaftsverwaltung GmbH, einer Firma von Brigitte Widmer – Scientologin und potente Spenderin für den Bau der Sektenzentrale. Die Wohnungen waren zuvor sehr günstig, eine 3-Zimmer-Wohnung kostete weniger als 1000 Franken.
Das Geschäft ging nicht reibungslos über die Bühne, weil sich einige der verbliebenen Mieter gegen ihre Kündigungen wehrten. Darunter zwei Gewerbler, eine Druckerei und ein Malergeschäft. Diese suchten Hilfe beim Mieterverband und erhoben Einsprache.
Eine erste Kündigung, ausgesprochen durch die Firma BW-Immobilientreuhand, ebenfalls aus dem Umkreis der Scientology, erfolgte zur Unzeit und wurde deshalb für ungültig erklärt. Das Bauprojekt in seiner ersten Version (hauptsächlich 1- und 2-Zimmer-Wohnungen) hielt der gerichtlichen Prüfung ebenso wenig stand und wurde für untauglich befunden. Die Mieter durften ein Jahr länger bleiben.
Nachträgliche Kosten
Unangenehm aufgefallen ist die Swiss Immo Trust auch auf dem Land. 2008 berichtete etwa der «Blick» von einer Überbauung in Therwil. Dort wurde sämtlichen 28 Mietparteien wegen Sanierungsbedarf gekündigt – ihre Wohnungen wurden danach während der Euro 08 aber für mehr als 400 Franken pro Tag an Fussballfans zwischenvermietet.
In einem anderen Fall in Oberwil kam es zwischen dem Unternehmen und
26 Käuferparteien von Eigentumswohnungen zu einem Streit wegen einer Rechnung von 600’000 Franken. Die Swiss Immo Trust wollte diese Anschlussgebühr für Wasser und Kanalisation nachträglich auf die Käufer überwälzen.
Diese gingen jedoch davon aus, dass diese Gebühren bereits im Kaufpreis enthalten gewesen waren. Erst nachdem wiederum die BaZ recherchiert hatte, zeigte sich die Swiss Immo Trust einsichtig und verzichtete auf die Forderung.
Doch nicht nur innerhalb des Basler Ablegers von Scientology ist dieses Unternehmen eine relevante Grösse. Wie unsere Datenauswertung zeigt, gehört die Swiss Immo Trust zu den wichtigsten Akteuren im Geschäft der Umwandlung von Mietwohnungen in Stockwerkeigentum.
Die TagesWoche hat die im Kantonsblatt publizierten Handänderungen auf dem Basler Immobilienmarkt seit Mitte 2008 ausgewertet. Eine solche Transaktion beschreibt den Verkauf einer Immobilie. Naturgemäss geschieht dies bei der Umwandlung in Stockwerkeigentum in relativ kurzer Zeit gleich mehrfach. Ein Unternehmen kauft eine Liegenschaft auf, renoviert oder baut neu und bringt die Wohnungen daraufhin einzeln auf den Markt. Statt einem einzelnen Eigentümer gibt es nun viele verschiedene.
Umstrittenes Business
Dieses Business gilt deshalb als umstritten, weil dadurch sehr oft günstiger Wohnraum verloren geht. Bevor die Umwandlung in Wohneigentum möglich ist, müssen die bisherigen Mieter nämlich weichen.
Zwischen 2010 und 2014 war die Swiss Immo Trust an über 50 solcher Handänderungen beteiligt. Bei 43 davon ging es um Stockwerkeigentum, verteilt auf insgesamt fünf Bauprojekte. Die Liegenschaften befinden sich allesamt im Gebiet zwischen Schützenmatt- und Kannenfeldpark. Bei all diesen Projekten immer mit dabei: Rudolf Flösser, leitender Direktor von Scientology Basel.
Grösstes Projekt war die Überbauung zwischen der Türkheimerstrasse und dem Spalenring. Dort kaufte die Swiss Immo Trust zwei ältere Liegenschaften auf, um sie durch einen Neubau mit 21 Eigentumswohnungen zu ersetzen.
Das Projekt an der Türkheimerstrasse wurde von der
BW-Liegenschaftsverwaltung geleitet, die sich ebenfalls in den Händen einer Scientologin befindet.
Dies Leitung dieses Projekts oblag der BW-Liegenschaftsverwaltung GmbH, einer Firma von Brigitte Widmer – Scientologin und potente Spenderin für den Bau der Sektenzentrale. Die Wohnungen waren zuvor sehr günstig, eine 3-Zimmer-Wohnung kostete weniger als 1000 Franken.
Das Geschäft ging nicht reibungslos über die Bühne, weil sich einige der verbliebenen Mieter gegen ihre Kündigungen wehrten. Darunter zwei Gewerbler, eine Druckerei und ein Malergeschäft. Diese suchten Hilfe beim Mieterverband und erhoben Einsprache.
Eine erste Kündigung, ausgesprochen durch die Firma BW-Immobilientreuhand, ebenfalls aus dem Umkreis der Scientology, erfolgte zur Unzeit und wurde deshalb für ungültig erklärt. Das Bauprojekt in seiner ersten Version (hauptsächlich 1- und 2-Zimmer-Wohnungen) hielt der gerichtlichen Prüfung ebenso wenig stand und wurde für untauglich befunden. Die Mieter durften ein Jahr länger bleiben.
Nachträgliche Kosten
Unangenehm aufgefallen ist die Swiss Immo Trust auch auf dem Land. 2008 berichtete etwa der «Blick» von einer Überbauung in Therwil. Dort wurde sämtlichen 28 Mietparteien wegen Sanierungsbedarf gekündigt – ihre Wohnungen wurden danach während der Euro 08 aber für mehr als 400 Franken pro Tag an Fussballfans zwischenvermietet.
In einem anderen Fall in Oberwil kam es zwischen dem Unternehmen und
26 Käuferparteien von Eigentumswohnungen zu einem Streit wegen einer Rechnung von 600’000 Franken. Die Swiss Immo Trust wollte diese Anschlussgebühr für Wasser und Kanalisation nachträglich auf die Käufer überwälzen.
Diese gingen jedoch davon aus, dass diese Gebühren bereits im Kaufpreis enthalten gewesen waren. Erst nachdem wiederum die BaZ recherchiert hatte, zeigte sich die Swiss Immo Trust einsichtig und verzichtete auf die Forderung.
Wednesday, April 24, 2019
贸易战尚未结束 中国与美国的世界领导权之争已开始
如果中美达成贸易协议,也似乎不可能结束这两个经济巨头之间的竞争。
在过去一年里,双方都开打了一场贸易战,对全球经济造成了破坏性后果。
但许多人士说,中美的争端远远超出了贸易的范围,它代表了两种截然不同的世界观之间的实力争斗。
无论是否达成交易,这种竞争都预计会继续扩大,并且变得更加难以解决。
咨询公司欧亚集团的亚洲事务部主任迈克尔·赫森(Michael Hirson) 表示,美中地缘政治竞争显著加剧,这已经是一个新的常态。
他认为,如果中美达成贸易协议,这将缓和一个阶段的中美实力争斗,但这只是暂时的,效果有限的。
分析人士称,由于中美双方都试图将自己确立为世界技术领袖,美中竞争很可能在关键的技术领域中表现出来。
近几个月来,在世界最大的这两个经济体之间的贸易谈判中,有关技术转让的问题一直是关键。
全球贸易咨询机构韩礼士基金会(Hinrich Foundation)的研究员斯蒂芬·奥尔森 (Stephen Olson) 表示: 现在每个国家都正确地认识到,他们的繁荣、财富、经济安全、军事安全都将与保持技术优势联系在一起。
很多人说,美中科技大战早已经开打。中国科技巨头华为处于这场战争的中心地位。
因为美国等其他国家提出,华为产品让人担忧安全问题,华为最近一直受到国际上的高度关注。
美国已经限制联邦机构使用华为产品,并鼓励其它盟国避免使用华为。
澳大利亚和新西兰都禁止其下一代5G网络工程使用华为产品。
但华为表示,该公司独立于中国政府。其创始人任正非2019年2月接受BBC专访时表示,他的公司绝不会从事任何间谍活动。
随着任正非的女儿2018年12月被捕,以及2019年华为对美国政府的诉讼,华为的争议白热化。
华为也发动了公关攻势,在《华尔街日报》上刊登了整版广告,告诉美国人不要 “相信你听到的一切”。
赫森表示,在美中整体关系紧张的背景下,“冷战”一词被滥用,但在描述中美技术竞争方面,这个词却越来越准确。
他指出,围绕华为的争议是“这种地缘政治竞争加剧的表现”。他认为,这种竞争远比纯粹的贸易问题更难解决。
怎么会发展到这个地步
近年来,美国对中国的担忧不断增加,包括对中国在世界各地不断增长的影响力。
这种担忧的原因很多,包括中国庞大的“一带一路”计划、“中国制造2025”计划,以及华为、阿里巴巴等公司日益强大。
美国副总统彭斯在2018年10月的演讲中总结了这种情绪,称中国在开放经济时,选择了“经济侵略”, 而不是“加强合作伙伴关系”。
过去,人们更希望中国会接受一种更西方的模式。现在,人们认识到中国经济与一个国家运营的体系都获得巨大发展,而两者没有相互矛盾。
咨询公司“控制风险”的中国事务分析主任安德鲁·吉尔霍尔姆 (Andrew Gilholm) 表示,在过去几年里, 中国的雄心更加彰显。
他表示,现在没有人想象中国还会效仿西方的自由民主模式,或者像几年前人们所希望的那样向市场经济靠拢。
在过去一年里,双方都开打了一场贸易战,对全球经济造成了破坏性后果。
但许多人士说,中美的争端远远超出了贸易的范围,它代表了两种截然不同的世界观之间的实力争斗。
无论是否达成交易,这种竞争都预计会继续扩大,并且变得更加难以解决。
咨询公司欧亚集团的亚洲事务部主任迈克尔·赫森(Michael Hirson) 表示,美中地缘政治竞争显著加剧,这已经是一个新的常态。
他认为,如果中美达成贸易协议,这将缓和一个阶段的中美实力争斗,但这只是暂时的,效果有限的。
分析人士称,由于中美双方都试图将自己确立为世界技术领袖,美中竞争很可能在关键的技术领域中表现出来。
近几个月来,在世界最大的这两个经济体之间的贸易谈判中,有关技术转让的问题一直是关键。
全球贸易咨询机构韩礼士基金会(Hinrich Foundation)的研究员斯蒂芬·奥尔森 (Stephen Olson) 表示: 现在每个国家都正确地认识到,他们的繁荣、财富、经济安全、军事安全都将与保持技术优势联系在一起。
很多人说,美中科技大战早已经开打。中国科技巨头华为处于这场战争的中心地位。
因为美国等其他国家提出,华为产品让人担忧安全问题,华为最近一直受到国际上的高度关注。
美国已经限制联邦机构使用华为产品,并鼓励其它盟国避免使用华为。
澳大利亚和新西兰都禁止其下一代5G网络工程使用华为产品。
但华为表示,该公司独立于中国政府。其创始人任正非2019年2月接受BBC专访时表示,他的公司绝不会从事任何间谍活动。
随着任正非的女儿2018年12月被捕,以及2019年华为对美国政府的诉讼,华为的争议白热化。
华为也发动了公关攻势,在《华尔街日报》上刊登了整版广告,告诉美国人不要 “相信你听到的一切”。
赫森表示,在美中整体关系紧张的背景下,“冷战”一词被滥用,但在描述中美技术竞争方面,这个词却越来越准确。
他指出,围绕华为的争议是“这种地缘政治竞争加剧的表现”。他认为,这种竞争远比纯粹的贸易问题更难解决。
怎么会发展到这个地步
近年来,美国对中国的担忧不断增加,包括对中国在世界各地不断增长的影响力。
这种担忧的原因很多,包括中国庞大的“一带一路”计划、“中国制造2025”计划,以及华为、阿里巴巴等公司日益强大。
美国副总统彭斯在2018年10月的演讲中总结了这种情绪,称中国在开放经济时,选择了“经济侵略”, 而不是“加强合作伙伴关系”。
过去,人们更希望中国会接受一种更西方的模式。现在,人们认识到中国经济与一个国家运营的体系都获得巨大发展,而两者没有相互矛盾。
咨询公司“控制风险”的中国事务分析主任安德鲁·吉尔霍尔姆 (Andrew Gilholm) 表示,在过去几年里, 中国的雄心更加彰显。
他表示,现在没有人想象中国还会效仿西方的自由民主模式,或者像几年前人们所希望的那样向市场经济靠拢。
Wednesday, March 13, 2019
रियाल मैड्रिड ने 10 महीने बाद जिडान को फिर से कोच बनाया, सोलारी को बर्खास्त किया
खेल डेस्क. फ्रांस के पूर्व फुटबॉल खिलाड़ी जिनेडिन जिडान को फिर से रियाल मैड्रिड का कोच बनाया गया है। जिडान ने पिछले साल मई में रियाल के कोच का पद छोड़ा था। 10 महीने बाद वे फिर कोच बनाए गए। सोमवार को क्लब के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर की बैठक के बाद यह फैसला लिया गया। जिडान 2020 तक टीम के कोच रहेंगे। रियाल ने मौजूदा कोच सेंटियागो सोलारी को बर्खास्त कर दिया। वे पांच महीने तक टीम के कोच रहे।
घर वापस आने से खुश हूं: जिडान
जिडान ने कहा, "घर वापस आने से खुश हूं। मैं टीम को फिर से उसी स्थान पर देखना चाहता हूं जहां ये हमेशा रहती है। बाहर से टीम के खराब प्रदर्शन को देखना अच्छा नहीं था।" जिडान के बाद रियाल ने जुलेन लोपेतगुई को पांच महीने के लिए कोच बनाया था। उनके बाद सोलारी ने यह पद संभाला था।
सोलारी के आने के बाद से टीम का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है। टीम चैंपियंस लीग से बाहर हो गई है। इसके अलावा ला लिगा में भी टीम शीर्ष पर चल रही बार्सिलोना से 12 अंक पीछे है। रियाल को कोपा डेलरे के सेमीफाइनल में बार्सिलोना से हार झेलनी पड़ी।
जिडान जनवरी 2016 से मई 2018 तक रियल मैड्रिड के कोच रहे थे। इस दौरान टीम ने तीन बार चैंपियंस लीग का जबकि एक बार ला लिगा का खिताब जीता था। इस दौरान टीम ने 149 मैचों में से 104 में जीत दर्ज की। 29 मैच ड्रॉ रहे।
जिडान की कोचिंग में टीम ने लगभग 70 फीसदी मैच जीते थे। इस सीजन में स्टार खिलाड़ी क्रिस्टियानो रोनाल्डो रियल को छोड़कर इटैलियन क्लब युवेंटस की ओर से खेल रहे हैं। युवेंटस के लिए रोनाल्डो ने 26 मैच में 19 गोल किए।
दोहा. अगला फीफा फुटबॉल वर्ल्ड कप कतर में 2022 में होना है। इसमें 48 टीमें शामिल हो सकती हैं। फीफा की हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट से ये जानकारी मिली है। फिलहाल वर्ल्ड कप में 32 टीमों के हिसाब से कार्यक्रम तैयार किया गया है। फीफा-2022 में 48 टीमों के खेलने पर अंतिम फैसला फीफा की जून में होने वाली बैठक में होगा।
पांच नए स्टेडियमों की तलाश जारी
रिपोर्ट के मुताबिक, फीफा बढ़ी हुई टीमों के लिए बहरीन, कुवैत, ओमान, सऊदी अरब और यूएई में नए स्टेडियम की तलाश भी शुरू कर चुका है। हालांकि, कतर से ही इन देशों से बात करने के लिए कहा गया है। टूर्नामेंट के मुकाबले कतर के आठ स्टेडियम में होने हैं। जिन पांच देशों में स्टेडियम खोजे जा रहे हैं उसकी दर्शक क्षमता कम से कम 40 हजार होनी चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार 10 स्टेडियम में 48 टीमों के आयोजन कराए जा सकते हैं।
आयोजकों को हो सकता है 2800 करोड़ रुपए का फायदा
फीफा वर्ल्ड कप में खेलने वाली टीमों की संख्या बढ़ने से आयोजकों को करीब 2800 करोड़ रुपए का फायदा हो सकता है। इसमें से 1100 करोड़ रुपए स्पांसर से और लगभग 850 करोड़ रुपए ब्रॉडकास्टिंग से मिल सकते हैं। इसके अलावा 627 करोड़ रुपए मैच के टिकट की बिक्री से भी मिलने की संभावना है।
घर वापस आने से खुश हूं: जिडान
जिडान ने कहा, "घर वापस आने से खुश हूं। मैं टीम को फिर से उसी स्थान पर देखना चाहता हूं जहां ये हमेशा रहती है। बाहर से टीम के खराब प्रदर्शन को देखना अच्छा नहीं था।" जिडान के बाद रियाल ने जुलेन लोपेतगुई को पांच महीने के लिए कोच बनाया था। उनके बाद सोलारी ने यह पद संभाला था।
सोलारी के आने के बाद से टीम का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है। टीम चैंपियंस लीग से बाहर हो गई है। इसके अलावा ला लिगा में भी टीम शीर्ष पर चल रही बार्सिलोना से 12 अंक पीछे है। रियाल को कोपा डेलरे के सेमीफाइनल में बार्सिलोना से हार झेलनी पड़ी।
जिडान जनवरी 2016 से मई 2018 तक रियल मैड्रिड के कोच रहे थे। इस दौरान टीम ने तीन बार चैंपियंस लीग का जबकि एक बार ला लिगा का खिताब जीता था। इस दौरान टीम ने 149 मैचों में से 104 में जीत दर्ज की। 29 मैच ड्रॉ रहे।
जिडान की कोचिंग में टीम ने लगभग 70 फीसदी मैच जीते थे। इस सीजन में स्टार खिलाड़ी क्रिस्टियानो रोनाल्डो रियल को छोड़कर इटैलियन क्लब युवेंटस की ओर से खेल रहे हैं। युवेंटस के लिए रोनाल्डो ने 26 मैच में 19 गोल किए।
दोहा. अगला फीफा फुटबॉल वर्ल्ड कप कतर में 2022 में होना है। इसमें 48 टीमें शामिल हो सकती हैं। फीफा की हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट से ये जानकारी मिली है। फिलहाल वर्ल्ड कप में 32 टीमों के हिसाब से कार्यक्रम तैयार किया गया है। फीफा-2022 में 48 टीमों के खेलने पर अंतिम फैसला फीफा की जून में होने वाली बैठक में होगा।
पांच नए स्टेडियमों की तलाश जारी
रिपोर्ट के मुताबिक, फीफा बढ़ी हुई टीमों के लिए बहरीन, कुवैत, ओमान, सऊदी अरब और यूएई में नए स्टेडियम की तलाश भी शुरू कर चुका है। हालांकि, कतर से ही इन देशों से बात करने के लिए कहा गया है। टूर्नामेंट के मुकाबले कतर के आठ स्टेडियम में होने हैं। जिन पांच देशों में स्टेडियम खोजे जा रहे हैं उसकी दर्शक क्षमता कम से कम 40 हजार होनी चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार 10 स्टेडियम में 48 टीमों के आयोजन कराए जा सकते हैं।
आयोजकों को हो सकता है 2800 करोड़ रुपए का फायदा
फीफा वर्ल्ड कप में खेलने वाली टीमों की संख्या बढ़ने से आयोजकों को करीब 2800 करोड़ रुपए का फायदा हो सकता है। इसमें से 1100 करोड़ रुपए स्पांसर से और लगभग 850 करोड़ रुपए ब्रॉडकास्टिंग से मिल सकते हैं। इसके अलावा 627 करोड़ रुपए मैच के टिकट की बिक्री से भी मिलने की संभावना है।
Friday, February 15, 2019
新疆“再教育营”:维族音乐家的生死罗生门
维吾尔音乐家阿不都日衣木·艾衣提(Abdurehim Heyit)(前译黑伊特)在中国新疆拘留营的生死受到外界关注。土耳其外交部根据早前对其已死的报道,要求中国关闭拘留营。但中国发布一段视频证明其还“活着”。
周日(2月10日)夜晚,中国官方媒体在“推特”上公布一段视频证明此前外界报道在中国新疆拘留营被指“已死”的维吾尔音乐家艾衣提还在世。
同日,中国驻土耳其大使馆发表声明称,“经查证,阿不都日衣木·艾衣提,男,57岁,维吾尔族,新疆歌舞团原演员。其因涉嫌危害国家安全罪被依法逮捕,目前身体健康,并非土方所说的已经死亡”。
该视频时间显示为2月10日。一名男子声称自己是维吾尔音乐家艾衣提,并称自己“身体状况良好”。
早前的报道称艾衣提“已死”,土耳其外交部周六(2月9日)要求中国关闭拘押约百万人的“再教育中心”。一些维吾尔人质疑该视频的真实性。
总部位于美国的维吾尔人权项目主席特克尔(Nury Turkel)告诉BBC,该视频的某些方面很“可疑”。该视频由中国国际广播电台的土耳其语部发布。艾衣提在视频中说,他“正因涉嫌违反国家法律而受到调查”。
土耳其穆斯林和来自中国大西北地区的维吾尔人在种族、文化和信仰上有紧密关联。
到目前为止,几乎没有以穆斯林为主的国家加入国际社会公开谴责中国新疆的拘留营。分析人士称,许多人担心中国的政治和经济报复。
不过,特克尔表示,中国发布该视频表明,中国政府确实会回应公众压力。
“中国政府回应土耳其是因为土耳其在穆斯林世界的影响。”他还补充说,联合国秘书长古特雷斯在新疆问题上“非常安静”。
“中国政府手上有主动权。他们拘留艾衣提,拘留了占总穆斯林人口10%的维吾尔人。他们试图告诉全世界,这里没有虐待,这些只有所谓的‘职业培训中心’。他们有责任证明视频是真实的。”他说。
特克尔说,由于“技术优势”,中国政府有能力篡改视频。“凭借今天的技术,可以造一个自述视频。这并不困难。”他说。
土耳其怎么说?
土耳其外交部发言人哈米·阿克索(Hami Aksoy)在星期六(2月8号)发表的一份声明中说:“有一百多万的维吾尔土耳其人被任意逮捕,他们在监狱中遭受酷刑和政治洗脑,这已不再是秘密。” 他还补充说,那些未被拘留的人也遭受“巨大压力”。
“在21世纪重新引入集中营以及中国当局对维吾尔族土耳其人的系统性同化政策是对人道的一大羞辱。” 阿克索说。
他还说,艾衣提已死的报道“让土耳其公众对新疆严重侵犯人权的行为有更强烈的反应”,他并呼吁联合国秘书长安东尼奥·古特雷斯(Antonio Guterres) “采取有效措施来结束(那里的)人间悲剧”。
中国驻土耳其大使馆2月10日发表声明称,土耳其外交部新闻发言人所说的"中国对所有宗教信仰实行同化政策",违背了宗教发展演变的规律,是对宗教中国化方向的歪曲,不符合中国宗教实际情况。北京声称新疆的拘留营是旨在帮助该地区摆脱恐怖主义威胁的“职业教育中心”。
去年10月,新疆维吾尔自治区主席雪克来提·扎克尔(Shohrat Zakir)在新华社的文章中表示,教育营中的“受训人员”感谢组织给机会“反思他们的错误”。
“再教育营”的学员说:“以前完全不掌握国家通用语言文字,也不懂法,犯了错也不知道,但政府并没有放弃我,积极挽救帮助我,让我免费吃住、免费学习,我现在各方面都有了很大进步,一定珍惜这个机会,以后做一个对国家、社会有用的人”。
人权组织称,穆斯林群体因拒绝提供DNA样本、说少数民族语言或与官员争吵等“违规行为”而受到指控。
周日(2月10日)夜晚,中国官方媒体在“推特”上公布一段视频证明此前外界报道在中国新疆拘留营被指“已死”的维吾尔音乐家艾衣提还在世。
同日,中国驻土耳其大使馆发表声明称,“经查证,阿不都日衣木·艾衣提,男,57岁,维吾尔族,新疆歌舞团原演员。其因涉嫌危害国家安全罪被依法逮捕,目前身体健康,并非土方所说的已经死亡”。
该视频时间显示为2月10日。一名男子声称自己是维吾尔音乐家艾衣提,并称自己“身体状况良好”。
早前的报道称艾衣提“已死”,土耳其外交部周六(2月9日)要求中国关闭拘押约百万人的“再教育中心”。一些维吾尔人质疑该视频的真实性。
总部位于美国的维吾尔人权项目主席特克尔(Nury Turkel)告诉BBC,该视频的某些方面很“可疑”。该视频由中国国际广播电台的土耳其语部发布。艾衣提在视频中说,他“正因涉嫌违反国家法律而受到调查”。
土耳其穆斯林和来自中国大西北地区的维吾尔人在种族、文化和信仰上有紧密关联。
到目前为止,几乎没有以穆斯林为主的国家加入国际社会公开谴责中国新疆的拘留营。分析人士称,许多人担心中国的政治和经济报复。
不过,特克尔表示,中国发布该视频表明,中国政府确实会回应公众压力。
“中国政府回应土耳其是因为土耳其在穆斯林世界的影响。”他还补充说,联合国秘书长古特雷斯在新疆问题上“非常安静”。
“中国政府手上有主动权。他们拘留艾衣提,拘留了占总穆斯林人口10%的维吾尔人。他们试图告诉全世界,这里没有虐待,这些只有所谓的‘职业培训中心’。他们有责任证明视频是真实的。”他说。
特克尔说,由于“技术优势”,中国政府有能力篡改视频。“凭借今天的技术,可以造一个自述视频。这并不困难。”他说。
土耳其怎么说?
土耳其外交部发言人哈米·阿克索(Hami Aksoy)在星期六(2月8号)发表的一份声明中说:“有一百多万的维吾尔土耳其人被任意逮捕,他们在监狱中遭受酷刑和政治洗脑,这已不再是秘密。” 他还补充说,那些未被拘留的人也遭受“巨大压力”。
“在21世纪重新引入集中营以及中国当局对维吾尔族土耳其人的系统性同化政策是对人道的一大羞辱。” 阿克索说。
他还说,艾衣提已死的报道“让土耳其公众对新疆严重侵犯人权的行为有更强烈的反应”,他并呼吁联合国秘书长安东尼奥·古特雷斯(Antonio Guterres) “采取有效措施来结束(那里的)人间悲剧”。
中国驻土耳其大使馆2月10日发表声明称,土耳其外交部新闻发言人所说的"中国对所有宗教信仰实行同化政策",违背了宗教发展演变的规律,是对宗教中国化方向的歪曲,不符合中国宗教实际情况。北京声称新疆的拘留营是旨在帮助该地区摆脱恐怖主义威胁的“职业教育中心”。
去年10月,新疆维吾尔自治区主席雪克来提·扎克尔(Shohrat Zakir)在新华社的文章中表示,教育营中的“受训人员”感谢组织给机会“反思他们的错误”。
“再教育营”的学员说:“以前完全不掌握国家通用语言文字,也不懂法,犯了错也不知道,但政府并没有放弃我,积极挽救帮助我,让我免费吃住、免费学习,我现在各方面都有了很大进步,一定珍惜这个机会,以后做一个对国家、社会有用的人”。
人权组织称,穆斯林群体因拒绝提供DNA样本、说少数民族语言或与官员争吵等“违规行为”而受到指控。
Friday, February 8, 2019
विरोध के बाद अब केंद्र सरकार रोस्टर सिस्टम पर बिल या अध्यादेश लाने को तैयार
बजट सत्र के दौरान शुक्रवार को मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने राज्यसभा में कहा है कि विश्वविद्यालयों की नियुक्तियों में आरक्षण संबंधी रोस्टर सिस्टम से अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और पिछड़े वर्ग के आरक्षण पर कोई असर नहीं पड़ने देंगे. उन्होंने कहा कि अगर कोर्ट से याचिका खारिज भी हो जाती है तो इसके लिए सरकार ने अध्यादेश या विधेयक लाने का फैसला किया है.
राज्यसभा में इस मुद्दे पर सपा, बसपा समेत कई विपक्षी दलों के हंगामे की वजह से पिछले तीन दिनों से जारी गतिरोध पर सरकार की अपना रुख साफ किया है. मंत्री जावड़ेकर ने कहा कि आरक्षण संबंधी रोस्टर सिस्टम पर सुप्रीम कोर्ट में सरकार पुनर्विचार याचिका दायर करेगी. उन्होंने कहा कि अदालत में अगर यह याचिका खारिज हो जाती है तो सरकार इसके लिए अध्यादेश या विधेयक भी लाएगी.
विपक्ष क्यों कर रहा है विरोध
बता दें कि सपा, बसपा, AAP और आरजेडी के सांसद उच्च शिक्षण संस्थाओं में नियुक्तियों में आरक्षण संबंधी 13 पॉइंट रोस्टर के बजाय 200 पॉइंट रोस्टर को वापस लाने के लिये अध्यादेश या विधेयक की मांग कर रहे हैं. इन सांसदों की दलील है कि रोस्टर सिस्टम से अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्गों का आरक्षण खत्म हो जाएगा.
शिक्षा मंत्री जावड़ेकर ने गुरुवार को राज्यसभा में इस मुद्दे पर बयान दिया था. उन्होंने बताया कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर लागू किए गए 200 पॉइंट रोस्टर सिस्टम के खिलाफ केंद्र सरकार की ओर सुप्रीम कोर्ट में दायर विशेष अनुमति याचिका खारिज करने के बाद सरकार अब पुनर्विचार याचिका दायर करेगी.
विपक्ष ने सरकार पर आरोप लगाया कि उसने कोर्ट में मजबूती से अपना पक्ष नहीं रखा है. विपक्षी दलों ने मांग कि अगर सरकार 2 दिन के भीतर सामान्य वर्ग को आरक्षण देने से जुड़ा बिल ला सकती है तो इस मुद्दे पर विधेयक या अध्यादेश क्यों नहीं ला रही है. जावड़ेकर ने कहा, ‘सरकार हमेशा सामाजिक न्याय के पक्ष में है, पुनर्विचार याचिका खारिज होने की स्थिति में सरकार ने अध्यादेश या विधेयक लाने का फैसला किया है.’
प्रकाश जावड़ेकर ने इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया पूरा होने तक उच्च शिक्षण संस्थाओं में नियुक्ति या भर्ती प्रक्रिया बंद रहने का भी भरोसा दिलाया. इस बीच विपक्ष के आरोपों के जवाब में जावड़ेकर ने अदालत में बहस के दस्तावेज को सदन के पटल पर पेश भी किया.
मंत्री ने बताया कि रोस्टर सिस्टम को यूनिवर्सिटी के बजाय विभाग के आधार पर लागू करने से विभिन्न वर्गों के आरक्षण पर पड़ने वाले बुरे असर का सरकार ने अध्ययन कराया है. जावड़ेकर ने बताया ‘हमने नया अध्ययन किया है जिसमें करीब 30 विश्वविद्यालयों की मौजूदा व्यवस्था का विश्लेषण कर यह जानने की कोशिश की गई है कि विभागवार रोस्टर सिस्टम लागू करने पर SC/ST आरक्षण को को किस तरह से नुकसान होगा.’
कैसे बदला रोस्टर सिस्टम
देश के विश्वविद्यालयो में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए पहले 200 पॉइंट रोस्टर के तहत आरक्षण की व्यवस्था थी. इस व्यवस्था के तहत विश्वविद्यालय को एक यूनिट माना जाता था. इसमें 1 से 200 पद के लिए 49.5 फीसदी आरक्षित वर्ग और 50.5 फीसदी अनारक्षित वर्ग के हिसाब से भर्ती की व्यवस्था थी. यूनिवर्सिटी को एक यूनिट मानने से सभी वर्ग के उम्मीदवारों की भागीदारी सुनिश्चित हो पाती थी.
नए नियम यानी 13 पॉइंट रोस्टर के तहत विश्वविद्यालय को यूनिट मानने के बजाय विभाग को यूनिट माना गया. इसमें पहला, दूसरा और तीसरा पद सामान्य वर्ग के लिए रखा गया है. जबकि चौथा पद ओबीसी वर्ग के लिए, पांचवां और छठां पद सामान्य वर्ग के लिए रखा गया है. इसके बाद 7वां पद अनुसूचित जाति के लिए, 8वां पद ओबीसी, फिर 9वां, 10वां, 11वां पद फिर सामान्य वर्ग के लिए. 12वां पद ओबीसी के लिए, 13वां फिर सामान्य के लिए और 14वां पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होगा. विपक्ष का आरोप है कि इस नए रोस्टर के तहत SC/ST और ओबीसी आरक्षण पर बुरा असर पड़ेगा और इस वर्ग के लोग यूनिवर्सिटी में जगह नहीं पा सकेंगे.
राज्यसभा में इस मुद्दे पर सपा, बसपा समेत कई विपक्षी दलों के हंगामे की वजह से पिछले तीन दिनों से जारी गतिरोध पर सरकार की अपना रुख साफ किया है. मंत्री जावड़ेकर ने कहा कि आरक्षण संबंधी रोस्टर सिस्टम पर सुप्रीम कोर्ट में सरकार पुनर्विचार याचिका दायर करेगी. उन्होंने कहा कि अदालत में अगर यह याचिका खारिज हो जाती है तो सरकार इसके लिए अध्यादेश या विधेयक भी लाएगी.
विपक्ष क्यों कर रहा है विरोध
बता दें कि सपा, बसपा, AAP और आरजेडी के सांसद उच्च शिक्षण संस्थाओं में नियुक्तियों में आरक्षण संबंधी 13 पॉइंट रोस्टर के बजाय 200 पॉइंट रोस्टर को वापस लाने के लिये अध्यादेश या विधेयक की मांग कर रहे हैं. इन सांसदों की दलील है कि रोस्टर सिस्टम से अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्गों का आरक्षण खत्म हो जाएगा.
शिक्षा मंत्री जावड़ेकर ने गुरुवार को राज्यसभा में इस मुद्दे पर बयान दिया था. उन्होंने बताया कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर लागू किए गए 200 पॉइंट रोस्टर सिस्टम के खिलाफ केंद्र सरकार की ओर सुप्रीम कोर्ट में दायर विशेष अनुमति याचिका खारिज करने के बाद सरकार अब पुनर्विचार याचिका दायर करेगी.
विपक्ष ने सरकार पर आरोप लगाया कि उसने कोर्ट में मजबूती से अपना पक्ष नहीं रखा है. विपक्षी दलों ने मांग कि अगर सरकार 2 दिन के भीतर सामान्य वर्ग को आरक्षण देने से जुड़ा बिल ला सकती है तो इस मुद्दे पर विधेयक या अध्यादेश क्यों नहीं ला रही है. जावड़ेकर ने कहा, ‘सरकार हमेशा सामाजिक न्याय के पक्ष में है, पुनर्विचार याचिका खारिज होने की स्थिति में सरकार ने अध्यादेश या विधेयक लाने का फैसला किया है.’
प्रकाश जावड़ेकर ने इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया पूरा होने तक उच्च शिक्षण संस्थाओं में नियुक्ति या भर्ती प्रक्रिया बंद रहने का भी भरोसा दिलाया. इस बीच विपक्ष के आरोपों के जवाब में जावड़ेकर ने अदालत में बहस के दस्तावेज को सदन के पटल पर पेश भी किया.
मंत्री ने बताया कि रोस्टर सिस्टम को यूनिवर्सिटी के बजाय विभाग के आधार पर लागू करने से विभिन्न वर्गों के आरक्षण पर पड़ने वाले बुरे असर का सरकार ने अध्ययन कराया है. जावड़ेकर ने बताया ‘हमने नया अध्ययन किया है जिसमें करीब 30 विश्वविद्यालयों की मौजूदा व्यवस्था का विश्लेषण कर यह जानने की कोशिश की गई है कि विभागवार रोस्टर सिस्टम लागू करने पर SC/ST आरक्षण को को किस तरह से नुकसान होगा.’
कैसे बदला रोस्टर सिस्टम
देश के विश्वविद्यालयो में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए पहले 200 पॉइंट रोस्टर के तहत आरक्षण की व्यवस्था थी. इस व्यवस्था के तहत विश्वविद्यालय को एक यूनिट माना जाता था. इसमें 1 से 200 पद के लिए 49.5 फीसदी आरक्षित वर्ग और 50.5 फीसदी अनारक्षित वर्ग के हिसाब से भर्ती की व्यवस्था थी. यूनिवर्सिटी को एक यूनिट मानने से सभी वर्ग के उम्मीदवारों की भागीदारी सुनिश्चित हो पाती थी.
नए नियम यानी 13 पॉइंट रोस्टर के तहत विश्वविद्यालय को यूनिट मानने के बजाय विभाग को यूनिट माना गया. इसमें पहला, दूसरा और तीसरा पद सामान्य वर्ग के लिए रखा गया है. जबकि चौथा पद ओबीसी वर्ग के लिए, पांचवां और छठां पद सामान्य वर्ग के लिए रखा गया है. इसके बाद 7वां पद अनुसूचित जाति के लिए, 8वां पद ओबीसी, फिर 9वां, 10वां, 11वां पद फिर सामान्य वर्ग के लिए. 12वां पद ओबीसी के लिए, 13वां फिर सामान्य के लिए और 14वां पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होगा. विपक्ष का आरोप है कि इस नए रोस्टर के तहत SC/ST और ओबीसी आरक्षण पर बुरा असर पड़ेगा और इस वर्ग के लोग यूनिवर्सिटी में जगह नहीं पा सकेंगे.
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